संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों हेतु कल्याणकारी योजनाओं का मूल्यांकन (सतना जिले के विशेष संदर्भ में)

 

प्रीति साकेत

शोधार्थी (वाणिज्य) शास. ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय, रीवा (.प्र.)

*Corresponding Author E-mail:  

 

ABSTRACT:

भारत एक विकासशील देश है। जिसमें औद्योगिकीकरण का महत्वपूर्ण स्थान है। औद्योगिक क्षेत्रों में कार्य करने वाली श्रमिकों की कार्य क्षमता बढ़ाया जाना आवश्यक है, क्योंकि औद्योगिक विकास को संचालित करने के लिए श्रम शक्ति एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। भारत में एक जन संख्या प्रधान देश है तथा मानव संसाधन का प्रयोग लगभग प्रत्येक औद्योगिक क्षेत्रों में होता है, क्योंकि श्रमिक मनुष्य होने के कारण उसमें चैतन्यता, गतिशीलता एवं संवेदनशीलता पाई जाती है। उसके द्वारा किए जाने वाले कार्यो में गुणवत्ता और विशेषता लाने के लिए श्रमिकों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। द्वितीय युद्ध के बाद मक्र्स द्वारा श्रमिकों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का विचार प्रकट किया गया था तथा श्रमिकों के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं विभिन्न देशों के सरकारों द्वारा बनाई एवं कार्यान्वित की गई। भारत में भी कल्याणकारी योजनाएं श्रमिकों के लिए बनाई गई इससे श्रम प्रबंध सबंध मधुर एवं प्रगाढ़ बनते है। श्रमिकों के उत्तरदायित्व का भाव पैदा होता है तथा औद्योगिक सहभागिता में अपना योगदान देने के लिए तत्पर रहते है। संगठित क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिकों का कल्याण प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं के अनुरूप एक आवश्यक कार्य है। श्रम संघों का गठन श्रमिकों की समस्याओं को सुनने एवं उनके अनुरूप कल्याणकारी कार्यो का अंजाम देने के श्रम कानून का निमार्ण किया गया। श्रम न्यायालय जिनमें श्रमिकों की ओर से मुख्य कानूनी सहायता शासन द्वारा पहुॅचायी जाती है। वर्तमान में श्रम कल्याण औद्योगिक क्षेत्र का अन्य महत्वपूर्ण कार्यो के समान माना जाता है तथा किसी औद्योगिक क्षेत्र की सफलता बिना श्रम कल्याण के संभव नहीं है। प्रस्तुत शोध इसी उद्देश्य से किया गया है। कि संगठित क्षेत्र में सतना जिले के श्रमिकोजिनमें महिला एवं पुरूष दोनों सम्मिलित है की कल्याण के लिए जो शासकीय योजनाएं बनाई गई है वे कहां तक लाभकारी रही है। कल्याणकारी योजनाओं का सही मूल्यांकन करना एवं उनका विश्लेषणात्मक अध्ययन करना इस शोध का प्रमुख उद्देश्य है।

 

श्रमिक, औद्योगिक क्षेत्र, कल्याणकारी योजनाएं, आर्थिक स्थिति।

 

 


संगठित औद्योगिक क्षेत्र में भारी संख्या में श्रमिक कार्यरत है। इस व्यवसायों में भी इन्हें पशुवत जीवन व्यतीत करना पड़ता है। ऐसे व्यवसायों में सिनेमा, होटल, शराबघर, जुआघर, गिरहकटी, चोरी इत्यादि मुख्य है। इन व्यवसायों में श्रमिकों को लाने के लिये प्रत्येक नगर में एजेन्ट होते है, जो गाॅवों से गरीब माॅ-बाप को बहकाकर युवकों को शहर में ले आते है। जहाँ उनको छोटी-मोटी नौकरी दिलाकर उनका शोषण करते हैं।

 

यूनीसेफ ने श्रमिकों को देश के महत्वपूर्ण ‘‘मानव संसाधन’’ के रूप में स्वीकार किया है और इस बात पर बल दिया है कि मानव निवेश या मानव पूँजी निर्माण की प्रत्येक दीर्घकालीन योजना युवाओं से प्रारम्भ की जानी चाहिए। क्योंकि युवाओं की संवृद्धि भविष्य में किसी भी समाज के सबसे बड़े संसाधन की समृद्धि होती है।

 

मानव एक जिज्ञासु प्राणी है जो प्रत्येक क्षण अज्ञात घटनाओं को जानने के लिए प्रयत्नशील रहता है। उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति जानते के पश्चात् ही शांत होती है। अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण ही वह जब तक अपने आस-पास की घटनाओं के संबंध में पूर्ण जानकारी नहीं प्राप्त, कर लेता तब तक चैन से नहीं बैठता, इस प्रकार जिज्ञासा के कारण ही मानव खोज के लिए प्रेरित होता है। यह खोज सदैव नवीन जानकारियाँ प्रदान करती है। इस प्रकार अनुसंधान की सहायता से मानव घटनाओं के अंतः स्थल तक पहुँच कर अपने ज्ञान का परिमार्जन करता है।

 

‘‘रेडमैन एवं मौर्यने लिखा है किनवीन ज्ञान प्राप्त हेतु व्यवस्थित प्रयत्न को ही हम अनुसंधान कहते है।’’ इसी प्रकार समाज विज्ञान ज्ञान कोष में अनुसंधान वस्तुओं, अवधारणों या प्रतीको आदि को कुशलता पूर्वक व्यवस्थित करना है जिसका उद्देश्य सामान्यीकरण द्वारा ज्ञान का विकास परिमार्जन अथवा सत्यापन होता है, चाहे वह ज्ञान व्यवहार में सहायक हो अथवा कला में।’’

 

पूर्व शोध की समीक्षा:-

देशपाण्डेय (1983) ने ऐतिहासिक प्रक्रिया में उन आर्थिक शक्तियों पर प्रकाश डाला जिन्होंने श्रम बाजार को विभक्त कर दिया। जबकि देशपाण्डे (1985) के पी-एच.डी., शोध का निष्कर्ष रहा है। ‘‘नगरीय असंगठित क्षेत्र, संगठित उत्पादन की प्रक्रिया ही एवं नगरीय असंगठित क्षेत्र की सफलता का कारण उनकी निम्न कीमत प्रक्रिया है।

 

फ्रीडमैन एवं सुलिवियन (1974) ने विकासशील अर्थव्यवस्था में नगरीय श्रम बाजार का अध्ययन किया है। जबकि रेम्पल एवं हाउस (1990) ने अपने अध्ययन में नगरीय श्रम बाजार की विविधता स्तरों पर प्रकाश डाला। नगरीय श्रम बाजार से सम्बन्धित विविध विषय यथा संगइन, कार्यकलाप, मजदूरी एवं वेतन संरचना, रोजगार सृजन एवं विभिन्न खण्डों के अंतः सम्बन्धों आदि पर विस्तृत विश्लेषण द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

 

एस.व्ही. सेथूरामन (1981) ने टाउन, लागोस, कानों एव कुमाती में नागरीय असंगठित क्षेत्र से सम्बद्ध आय, मूल्यवर्धन, पंूजी निवेश, प्रवासन आदि से सम्बन्धित महत्वपूर्ण आंकड़ों को प्रस्तुत किया।

 

स्कोविल (1991) ने जहां अपने अध्ययन में नगरीय श्रम की संचना, उत्पादनकर्ता, विकास दर, प्रशिक्षण व्यय एवं इससे सम्बन्धित विभिन्न नितियों का मूल्यांकन प्रस्तुत किया।

 

ैण्टण् ैमजीनतंउंद ;1981द्ध ने फीआउन, लार्गोस, कानों एवं कुमासी में नगरीय असंगठित क्षेत्र से सम्बन्धित महत्वपूर्ण आंकड़ो को प्रस्तुत किया।

 

ैबवअपससम ;1981द्ध ने जहां अपने अध्ययन में नगरीय श्रम की संरचना उत्पादकता, विकास दर, प्रशिक्षण व्यय एवं इससे सम्बन्धित विभिन्न नीतियों का मूल्यांकन प्रस्तुत किया। वहीं डवपत ;1981द्ध ने श्रम शक्ति की संरचना एवं नगरी करण तथा विकास का काल श्रेणियों के माध्यम से अध्ययन किया। ।सवद्रवए वं डंदहंीे ;1989द्धए छंकअपए ;1990द्ध छम्क्। ;1985द्धए ज्ञनसेीतमेीजीं ;1998द्धए ।इवंहलम ;1986द्धए ज्तंहमत ;1987द्ध तथा ज्ञीदकंए व्। ज्ञनदकन ;1998द्ध ।संउ ;1986द्ध ने नगरीय असंगठित क्षेत्र से सम्बन्धित अनेक तत्वों पर प्रकाश डाला, यथा, विशेषताएँ, अवधारणाएँ, साहसी, श्रम रोजगार उत्पादन, कौशल, कार्यकरण, आय, कार्यदशाएँ, कार्य निष्पादन, विकास, निर्धनता, आदि।

 

 

शोध का उद्देश्य:-

शोध या अन्वेषण किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए किया जाता है। शोधार्थी के मन में सदैव यह उत्कंण बनी रहती है थी कि क्या वर्तमान औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों अपने उद्देश्यों के अनुरूप सही दिशा की ओर चलायमान है? प्रत्येक कार्य का उद्देश्य अवश्य होता है। उद्देश्यों के अनुरूप कार्यो का निष्पादन करने पर ही वांछित परिणाम प्राप्त होते है। शोध का मुख्य उद्देश्य अध्ययन क्षेत्र में व्याप्त समस्याओं के सम्बन्ध में समाधान ढूढ़कर सुझाव प्रस्तुत करना, जिससे श्रमिकों का सर्वागीण विकास हो सके।

 

स्वतंत्रता पश्चात औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों में व्यापक परिवर्तन लाने हेतु विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में व्यापक धनराशि की व्यवस्था की गई है। परम्परागत कृषि में सुधार लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास तथा अधोसंरचनात्मक विकास की दिशा में व्यापक प्रयास किये गये, किन्तु श्रमिकांे के समस्याओं का पूर्णतः निदान नहीं हुआ है। श्रमिक ऋण ग्रस्तता, निरक्षरता, निर्धनता, अहिंसा, बेरोजगारी एवं भेदभव का शिकार बनी हुई है।

 

वर्ष 1991 में देश में नयी आर्थक नीति लागू की गयी जो देश के विकास में सहायक सिद्ध हुई है, शोध प्रबंध का उद्देश्य यह भी ज्ञात करना है, कि नयी आर्थिक नीति का औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों पर क्या प्रभाव पड़ा।

 

प्रस्तुत अध्ययन का मुख्य उद्देश्य मध्यप्रदेश के सतना जिले में स्थितसंगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों हेतु कल्याणकारी योजनाओं का मूल्यांकनका अध्ययन करना है। अतः अनुसंधानसत्र्री द्वारा निम्नलिखित उद्देश्यों को ध्यान मंे रखकर अध्ययन किया गया है।

1.     संगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों का पारिवारिक पृष्टभूमि इसके संचालन एवं क्रियान्वयन का निरीक्षण कर उसका मूल्यांकन करना।

2.     संगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की सामाजिक- आर्थिक दशाओं का अध्ययन करना।

3.     संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों के लाभान्वित परिवारों के आर्थिक विकास की दर प्राप्त कर उसकी समीक्षा करना।

4.     संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों के लिये चलाई जा रही वेल्फेयर की योजनाएं तथा इन योजनाओं के क्रियान्वयन के फलस्वरूप पड़ने वाले आर्थिक प्रभावों की विवेचना करना।

5.     श्रमिकों के सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले श्रम-अधिनियमों के प्रभावों का अध्ययन करना।

6.     सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर श्रमिकों के कल्याण हेतु किये जाने वाले प्रयासों का आंकलन करना।

7.     श्रमिकों द्वारा औद्योगिक कार्य अपनाने से जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना।

8.     संगठित क्षेत्र में श्रमिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु योजनाओं में होने वाली कमियों का अध्ययन कना।

 

शोध प्रविधि:-

ज्ञान के क्षेत्र में शोधकार्य अपरिहार्य है। वर्तमान युग में शोध का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि किसी भी क्षेत्र में संबंधित तथ्यों का प्रमाणीकरण, नवीनीकरण एवं सत्यापन शोध के द्वारा ही किया जा सकता है।

 

विकास के इस धरातल पर भी देश के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ विकास की गति धीमी है। ऐसे ही क्षेत्रों में से एक अपना शहरी क्षेत्र सतना जिला भी है जहाँ प्राकृतिक भू-बनावट के कारण भूजल की पर्याप्त है। भू-जल स्तर निरन्तर नीचे की ओर अभिमुख है बढ़ती जनसंख्या ने वनों के स्वरूप को विखंडित कर दिया है। अतः ऐसे क्षेत्रों के विकास के लिए सरकारी स्तर पर किये जा रहे प्रयासों के साथ एक ऐसे असंगठित क्षेत्र के साथ कार्यरत महिला श्रमिकों के गुणात्मक विकास की जो भी सुविधाएं प्राप्त हो रही हैं, उन्हीं के द्वारा विकास कर सके। असंगठित क्षेत्र के विकास की उक्त भावधारा संचालित एक ऐसे ही सुन्दर स्वरूप है, जो अपने कार्यक्रमों द्वारा सतना जिले के असंगठित क्षेत्र के विकास हेतु संलग्न है।

 

असंगठित क्षेत्र के विकास संबंधित कार्यालयों, अधिकारियों स्थानीय स्तर से सम्पर्क कर प्रश्नावली, अनुसूची, साक्षात्कार विधि तथा आंकड़ों का संग्रहण किया जाएगा। आंकड़ों का संग्रहण में सर्वेक्षण, निरीक्षण, साक्षात्कार विधियाँ के साथ आरेख एवं तालिकाओं की सहायता ली जाएगीं। असंगठित क्षेत्र के उद्योगों से जुड़ी अनेकों योजनाएं तथा सूचनाएं आंकड़े, प्राप्त किए जाएंगे। सतना जिले के असंगठित क्षेत्रमें मूल रूप से कार्यरत महिला श्रमिकों के रूप में जीवन-यापन की पूर्ति हेतु सम्पूर्ण रोजगार उपलब्ध कराने की योजना है। जिससे क्षेत्र के गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों को आसानी से रोजगार तथा आय के स्थायी इन्तजाम हो सकें।

 

उपकल्पना:-

चिंतन और जिज्ञासा मानव की दो, मूल प्रवृत्तियां हैं और इसके वैज्ञानिक आधार केन्द्र बिन्दु भी हैं उपकल्पना सामाजिक शोध की प्रथम सीढ़ी है। शोध कार्य प्रारंभ करने के पूर्व शोध के कारणों समस्याओं के सामाधान एवं परिणाम के बारे में हम जो एक निश्चित रूपरेखा बना लेते हैं उसे उपकल्पना कहते हैं।

 

अनुसंधानकत्र्री द्वारा मार्गदर्शन कठिनाईयों से बचने के लिए कुछ प्रमुख उपकल्पनाओं का निर्माण किया गया है, जो अधोलिखित है -

1.     औद्योगिक श्रमिकों की सामाजिक -आर्थिक पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हुई है।?

2.     एकाकी परिवार में रहने वाले श्रमिक/संयुक्त परिवार में रहने वाले श्रमिक की अपेक्षा कम ऋण लेते है।

3.     निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थित प्राप्त श्रमिक पुरानी परम्प्राओं को अधिक मान्यता देते हैं।

4.     श्रमिकों को भौतिक दशाओं एवं पर्यावरणीय दशाओं में उत्तरोत्तर सुधार हुआ है।

5.     श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर श्रम-अधिनिमों का सार्थक प्रभाव पड़ा है।

6.     श्रमि अधिनियमों के साथ श्रमिक स्वयं को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित महसूस करते है।

7.     श्रमिकों के प्रति अधिकारियों का दृष्टिकोण उपेक्षित होता है।

8.     श्रम-कल्याण की सुविधाओं एवं श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के सुधार में प्रत्यक्ष सम्बन्ध है।

9.     उच्च सामाजिक-आर्थिक स्थिति प्राप्त श्रमिक ऋण लेने के पक्ष में नहीं होते है।

 

अध्ययन का क्षेत्र एवं शोध प्रारूप -

विन्ध्य का गौरव सतना उत्तरी पूर्व मध्यवर्ती क्षेत्र में स्थित है सतना नगर का कुल क्षेत्रफल 11187.70 हेक्टेयर पर फैला हुआ है तथा इसकी नगर पालिका की सीमा 7186.20 हेक्टेयर पर फैला है। नगर पालिका की दृष्टि से 45 वार्ड बने हुए है सतना की औद्योगिक नगरी के रूप में विश्वमान चित्र पर पहचान मिल चुकी है। 229307 आबादी वालले इस नगर में सात बड़ी औद्योगिक इकाइयों समेत कई छोटे मोटे लघु उद्योग इकाइयाँ स्थापित हैं। जिले का कुछ क्षेत्रफल 7495 वर्ग कि.मी. है, जो कि मध्यप्रदेश के मूल भौगोलिक क्षेत्रफल का 1.8 प्रतिशत है। जनसंख्या की दृष्टि से सतना जिला मध्यप्रदेश में औसत से आगे है। 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या 2228935 है, जिसमें पुरूषों की संख्या 1157495 तथा महिलाओं की संख्या 1071440 है। सतना जिले में जनसंख्या का घनत्व 297 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। जिले की साक्षरता प्रतिशत 72ण्26 प्रतिशत व्यक्ति शिक्षित है जिसमें पुरूष का साक्षरता प्रतिशत 81ण्37 एवं महिलाओ का साक्षरता प्रतिशत 62ण्45 है।1

 

तथ्यों का सारणीयन विश्लेषण एवं व्याख्या -

शोधार्थी द्वारा किया गया कोई भी शोघ कार्य सही अर्थो में तभी प्रभावी होते है, जब शोधार्थी द्वारा उस समस्या की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन किया जाये। इसके लिये यह आवश्यक है कि शेाधार्थी द्वारा शेाध अध्ययन मेें उपयोग किये गये समस्त शेाध उपकरण द्वारा प्राप्त जानकारियों को व्यवस्थित क्रम में सारणीबद्ध किया जाये। शोध द्वारा तथ्यों को प्राप्त करने के बाद संकलित तथ्यों को सारणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है और सांख्यिकी विश्लेषण किया गया है-

 

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि 100 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक परिवारों में से 72 प्रतिशत श्रमिक परिवार ऐसे है जो एकल परिवार की श्रेणी में आते हैं, जबकि 28 प्रतिशत परिवार ऐसे है जो संयुक्त परिवार की श्रेणी में आते है। इस प्रकार सतना नगर के संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक परिवारों मंे से दो तिहाई एकल स्वरूप के है। अतः हम कह सकते है कि सतना नगर में भी संयुक्त परिवार के स्वरूप में तेजी से परिवर्तन हो रहा है।

 

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि सतना नगर के 100 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों में से 52 श्रमिक परिवारों में 3 व्यक्ति कार्य करते हैं जबकि 23 श्रमिक परिवारों मंे 4 और 25 श्रमिक परिवारों में 5 व्यक्ति कार्य करते है। इस प्रकार से स्पष्ट है कि परिवार में 3 सदस्यों के कमाने की संख्या सबसे अधिक है जबकि 4 सदस्यों के कमाने वाली संख्या सबसे कम अर्थात् 23 है।

 

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि सतना नगर के 100 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों में से सिर्फ 7 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों का ही स्वास्थ्य अच्छा है जबकि 19 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों का स्वास्थ्य समान्य है। दो तिहाई श्रमिक अर्थात 74 प्रतिशत संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों का स्वास्थ्य खराब पाया गया है। अतः निम्न सारणी से ज्ञात होता है कि सतना नगर के संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों के स्वास्थ्य की स्थिति अत्यन्त निम्न है क्यांेकि अधिकतर संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक किसी किसी छोटी-मोटी बिमारी के शिकार है।

 

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि 100 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक में से लगभग 42 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों में से लगभग आधे पर संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकांे की मासिक आय 1500 से 2000 रूपये है जबकि 26 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की मासिक आय 1250 से 1500 रूपये तक है। 15 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की आय 2000 से 3000 रूपये तक है और 11 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की मासिक आय 3000 से 4000 रूपये तक है। 4000 से 5000 रूपये मासिक आय वाले संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकांे की संख्या मात्र 6 है इस प्रकार स्पष्ट है कि लगभग दो तिहाई संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक ऐसे है जिनकी मासिक आय 1500 से 2000 रूपये तक है।

 

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि 100 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों में से 64 प्रतिशत संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों को शासन द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का लाभ नहीं मिला जबकि 36 प्रतिशत संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों को शासन द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का लाभ मिला जिससे संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की संख्या में कुछ हद तक कमी पायी गयी।

 

 

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि 100 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों में से 53 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकांे के माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को पढ़ा पाने के कारण आर्थिक तंगी है, जबकि 47 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिको के माता पिता अपने बच्चों को अज्ञानता के कारण शिक्षा नहीं दिलाते हंै। वे शिक्षा के महत्व को बिल्कुल नहीं समझते हैं। उनकी मान्यता है कि पढ़ने के बाद बच्चों को नौकरी मिलेगी ही नहीं अतः व्यर्थ में बच्चों की शिक्षा में खर्च करने से कोई ज्यादा फायदा नहीं होगा अतः वे शुरू से ही अपने बच्चों को रोजगार में लगा देना उचित समझते हैं।

 

उपरोक्त सारणी से स्पष्ट होता है कि सर्वेक्षण किए गए 200 संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिको में से 55.00 प्रतिशत चालको के परिवार की संख्या 2 से 4 के बीच में है, 4 से 5 के बीच संख्या वाले परिवारो का प्रतिशत 30.00 है। 6 से अधिक संख्या वाले परिवार का प्रतिशत 15.00 पाया गया है। ये वे परिवार है जो अभी भी संयुक्त परिवार में रहते है। सतना नगर में संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्य करने वाले ज्यादातर सतना नगर के मोहल्ले की महिलाए है जो बेरोजगारी एवं गरीबी से तंग आकर संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक में कार्यरत हो जाती है। संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिको के सर्वेक्षण के दौरान एक तथ्य सामने आया कि सतना नगर में अशिक्षित की महिला श्रमिको संख्या बहुत ही अधिक है।

 

 

संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिको के बच्चो की शैक्षणिक स्थिति

 

उपरोक्त सारणी के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक अपने बच्चो को शिक्षित करने के पक्ष में है क्योंकि 90.00 प्रतिशत संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिको के बच्चे स्कूल जाते है और मात्र 10.00 प्रतिशत संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिको के बच्चे स्कूल नही जाते हैं संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकी करते हैं इनके आवास में भी भिन्नता पाई गई। संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिको के आवास से संबंधित जो सूचनाए सर्वेक्षण के दौरान प्राप्त हुई वे निम्न सारणी से स्पष्ट है।

 

निष्कर्ष:-

औद्योगिक विकास के साथ-साथ यह बात देखी गई कि पूंजीपति इस बात के लिये बहुत उत्सुक थे कि शीघ्र ही अधिक लाभ हो, जिससे उन्होंने स्त्री, पुरुष तथा असहाय बच्चों तक को काम में लगा दिया। सतना जिले के संगठित औद्योगिक क्षेत्र में भारी संख्या में श्रमिक कार्यरत है। इस व्यवसायों में भी इन्हें पशुवत जीवन व्यतीत करना पड़ता है। ऐसे व्यवसायों में सिनेमा, होटल, शराबघर, जुआघर, गिरहकटी, चोरी इत्यादि मुख्य है। इन व्यवसायों में श्रमिकों को लाने के लिये प्रत्येक नगर में एजेन्ट होते है, जो गाॅवों से गरीब माॅ-बाप को बहकाकर युवकों को शहर में ले आते है। जहाँ उनको छोटी-मोटी नौकरी दिलाकर उनका शोषण करते हैं। यूनीसेफ ने श्रमिकों को देश के महत्वपूर्ण ‘‘मानव संसाधन’’ के रूप में स्वीकार किया है और इस बात पर बल दिया है कि मानव निवेश या मानव पूँजी निर्माण की प्रत्येक दीर्घकालीन योजना युवाओं से प्रारम्भ की जानी चाहिए। क्योंकि युवाओं की संवृद्धि भविष्य में किसी भी समाज के सबसे बड़े संसाधन की समृद्धि होती है।

 

सुझाव:-

संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की स्थिति काफी खराब है। अतः यह देखते हुये सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिये तथा उनके शारीरिक, आर्थिक समाजिक शोषण को रोकने के लिये काननू को सक्त होना चाहिये और श्रमिकों को शिक्षित करने के लिये निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिये तथा पीड़ित श्रमिकों को कानूनी सहायता प्रदान की जानी चाहिये तथा उन्हे उचित प्रशिक्षण तथा दिशा निर्देश दी जानी चाहिए। महिलाओं का शोषण करने वाले को दण्डित किया जाना चाहिय, ताकि उन्हें सबके मिल सके। श्रमिकों को रोजगार हेतु विभिन्न प्रकार के व्यवसायिक प्रशिक्षण प्रदान किये जाने चाहिय, ताकि वे स्वावलम्बी बन सके। संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की समाज शास्त्रीय अध्ययन में सुझाव के तौर पर बिन्दुवार समझाने का प्रयास किया गया है:-

1.     इन्हें सरकार द्वारा चलाये गये योजनाओं का ग्रामीण स्तर पर पहुँचाया जाय।

2.     सररकार को ग्रामीण स्तर पर संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक के समस्याओं का कैम्प लगाकर निवारण किया जाय।

3.     संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों को समय-समय पर कृषि के वैज्ञानिक तरीको का जानकारी दी जाय।

4.     संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक प्राय अशिक्षित होते है, जिनको शिक्षा के माध्यम से मजबूत बनाया जाय।

5. संगठित औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों के पास आर्थिक समस्या बहुत आती है, इसलिये निशुल्क ऋण उपलब्ध कराई जाये।

 

संदर्भ:-

1.     सक्सेना, एस.सी. (1992), ‘श्रम समसयें एवं सामाजिक सुरक्षा’, रस्तोगी पब्लिकेशन शिवाजी रोड, मेरठ।

2.     शर्मा, डाॅ. एम.के. (2010), ‘भारतीय समाज में नारी’, पब्लिशिंग हाउस दिल्ली।

3.     आहुजा राम (2000), ‘सामाजिक समस्यायें, रावत पब्लिकेशन, जयपुर एवं नई दिल्ली।

4.     गिरि, व्ही.व्ही. (1957) भारतीय मजदूरों की समस्याएँ एशिया पब्लिशिंग हाउस बम्बई।

5.     27.    सक्सेना, डाॅ. आर.सी. (1982) श्रम समस्याएं एवं सामाजिक सुरक्षा, रस्तोगी पब्लिकेशन शिवाजी रोड मेरठ।

6.     अग्रवाल, गोपाल कृष्ण (1993) भारतीय समाजिक संस्थायें, आगरा बुक स्टोर, आगरा।

7.     बावेल, बसन्ती लाल (1989) भारत की संवैधानिक विधि, सेन्ट्रल ला एजेन्सी, मोतीलाल नेहरू रोड इलाहाबाद।

8.     शर्मा डाॅ. ब्रह्मदेव (1986) शिक्षा समाज और व्यवस्था, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल।

9.     स्तनास्तव डाॅ. राजमणिलाल (1969) मजदूरी तथा सामाजिक सुरक्षा, प्रसाद प्रकाशन मंदिर कानपुर।

10.    लवानिया, एम.एम. (1989) भारतीय सामाजिक व्यवस्था, रिसर्च पब्लिकेशन, जयपुर,

11.    गुप्ता मोतीलाल (1973) भारतीय सामाजिक संस्थायें, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, -26/2 विद्यालय मार्ग तिलक नगर जयपुर।

 

 

 

 

 

Received on 18.06.2019            Modified on 10.07.2019

Accepted on 31.07.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(3):667673.